/lotpot/media/media_files/2026/02/09/haathi-giraffe-magarmach-ki-jadui-kahani-1-2026-02-09-11-54-52.jpg)
हाथी, जिराफ और मगरमच्छ:- बहुत दूर, पहाड़ियों के बीच एक जंगल (Forest) - विकिपीडिया बसा हुआ था, जिसका नाम था 'नीलगिरी वन'। यह जंगल अपनी सुंदरता और शांति के लिए जाना जाता था। यहाँ के जानवर आपस में मिल-जुल कर रहते थे। इसी जंगल में तीन जिगरी यार थे - 'धमचक' (एक विशाल हाथी), 'लंबू' (एक गर्दन वाला जिराफ) और 'जग्गू' (एक सुस्त मगरमच्छ)। ये तीनों अलग-अलग प्रजाति के थे, लेकिन उनकी दोस्ती की मिसालें पूरे जंगल में दी जाती थीं।
धमचक अपनी ताकत के लिए मशहूर था, लंबू अपनी ऊँचाई के लिए, और जग्गू पानी में अपनी फुर्ती के लिए। लेकिन, जैसा कि अक्सर होता है, हम अपनी खूबियों से ज्यादा अपनी कमियों पर ध्यान देते हैं। ये तीनों दोस्त भी अपनी-अपनी शारीरिक बनावट से खुश नहीं थे।
असंतोष के बादल
/filters:format(webp)/lotpot/media/media_files/2026/02/09/haathi-giraffe-magarmach-ki-jadui-kahani-3-2026-02-09-12-04-54.jpg)
एक सुहावनी शाम को तीनों नदी किनारे बैठे थे। सूरज ढल रहा था और आसमान में नारंगी रंग बिखरा हुआ था। लेकिन इनके चेहरों पर उदासी थी। धमचक ने अपनी लंबी सूंड को पानी में पटका और दुखी होकर बोला, "दोस्तों, मैं इस लंबी नाक (सूंड) से तंग आ गया हूँ। यह हर जगह फँस जाती है। चलते समय झूलती रहती है। काश! मेरी नाक भी छोटी होती, जैसे शेर या चीते की होती है।"
लंबू ने भी एक गहरी आह भरी और अपनी लंबी गर्दन को नीचे झुकाते हुए कहा, "सही कह रहे हो धमचक भाई। मेरी हालत देखो। इतनी लंबी गर्दन है कि नीचे झुककर पानी पीने में भी नानी याद आ जाती है। सोने के लिए भी मुझे कितना कष्ट उठाना पड़ता है। काश! मेरी गर्दन भी छोटी और सामान्य होती।"
जग्गू मगरमच्छ, जो रेत पर लेटा था, अपने छोटे-छोटे पैरों को देखकर रोनी सूरत बनाकर बोला, "तुम लोग फिर भी ठीक हो। मेरे इन नन्हे पैरों को देखो। मैं जमीन पर कितना धीमे चलता हूँ। सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। काश! मेरे पैर भी घोड़े या हिरण की तरह लंबे और मजबूत होते, तो मैं भी जंगल में दौड़ लगा पाता।"
रहस्यमयी ऋषि और जादुई झरना
तभी झाड़ियों में हलचल हुई और वहां से एक बुजुर्ग कछुआ निकला। वे जंगल के सबसे पुराने और ज्ञानी जीव थे, जिन्हें सब 'महामुनि' कहते थे। उन्होंने तीनों की बातें सुन ली थीं। महामुनि मुस्कुराए और बोले, "बच्चों, मैंने तुम्हारी शिकायतें सुनीं। अगर तुम वाकई अपने शरीर से खुश नहीं हो, तो जंगल के उत्तर में 'मायावी झरना' बहता है। आज पूर्णिमा की रात है। जो भी उस झरने के पानी में अपनी परछाई देखकर जो मांगेगा, उसे वह मिल जाएगा।"
तीनों दोस्तों की आँखों में चमक आ गई। वे बिना सोचे-समझे उत्तर दिशा की ओर दौड़ पड़े। हिंदी कहानियां में अक्सर जादू का जिक्र होता है, लेकिन यहाँ जादू एक सबक सिखाने वाला था।
काफी मशक्कत के बाद वे मायावी झरने के पास पहुँचे। पूर्णिमा का चाँद पानी में चमक रहा था। सबसे पहले धमचक आगे आया। उसने पानी में देखा और कहा, "हे जादुई झरने! मेरी सूंड छोटी कर दो।" अचानक पानी में एक तेज रोशनी हुई और धमचक की लंबी सूंड गायब हो गई, उसकी जगह एक छोटी सी नाक आ गई। वह खुशी से झूम उठा।
फिर लंबू आया। उसने कहा, "मुझे छोटी गर्दन चाहिए!" रोशनी फिर चमकी और लंबू की गर्दन घोड़े जैसी छोटी हो गई।
अंत में जग्गू ने मांग की, "मुझे लंबे और मजबूत पैर दो!" जादू हुआ और जग्गू के छोटे पैर लंबे और गठीले हो गए। तीनों दोस्त अपने नए रूप को देखकर बहुत खुश हुए और जश्न मनाने लगे।
नई काया, नई मुसीबतें
/filters:format(webp)/lotpot/media/media_files/2026/02/09/haathi-giraffe-magarmach-ki-jadui-kahani-2-2026-02-09-12-04-54.jpg)
अगली सुबह जब नींद खुली, तो जंगल में सूरज की किरणें फैल चुकी थीं। तीनों को लगा कि अब उनकी जिंदगी बदल जाएगी, लेकिन हुआ कुछ और ही।
धमचक को प्यास लगी। वह नदी पर गया। आदत के अनुसार उसने पानी पीने की कोशिश की, लेकिन उसकी सूंड तो थी ही नहीं! वह पानी तक पहुँचने के लिए घुटनों के बल बैठा, फिर भी उसका मुंह पानी तक नहीं पहुँचा। वह प्यास से तड़पने लगा। न ही वह अपनी पीठ पर पानी डालकर ठंडक ले पा रहा था, और न ही ऊँचे पेड़ों से ताजे पत्ते तोड़ पा रहा था। उसका विशाल शरीर अब उसके लिए एक बोझ बन गया था।
उधर लंबू को भूख लगी। उसे ऊँचे पेड़ों की सबसे कोमल पत्तियां खानी थीं। लेकिन उसकी गर्दन तो अब छोटी थी। वह उचक-उचक कर कोशिश करने लगा, लेकिन नाकाम रहा। मजबूरन उसे जमीन पर पड़ी सूखी और धूल भरी घास खानी पड़ी, जिससे उसके पेट में दर्द हो गया। साथ ही, छोटी गर्दन होने के कारण वह दूर से आते खतरों को देख नहीं पा रहा था।
जग्गू की हालत तो और भी खराब थी। उसके लंबे पैर तो आ गए थे, लेकिन उनका वजन वह संभाल नहीं पा रहा था। जब वह शिकार के लिए नदी में उतरा, तो लंबे पैरों की वजह से वह ठीक से तैर नहीं पाया। उसका शरीर पानी के ऊपर ही तैरता रहा, जिससे मछलियां उसे दूर से ही देखकर भाग गईं। जमीन पर चलने की कोशिश की, तो उसका भारी शरीर और लंबे पैर आपस में उलझ गए और वह मुंह के बल गिर पड़ा।
खतरे की घंटी और पछतावा
दोपहर होते-होते तीनों दोस्तों का बुरा हाल हो गया था। तभी जंगल में साहस की असली परीक्षा की घड़ी आ गई। एक खूंखार तेंदुआ वहां आ धमका।
सामान्य रूप में, लंबू अपनी ऊँचाई से उसे मीलों दूर से देख लेता और सबको सावधान कर देता। लेकिन आज उसे कुछ नहीं दिखा। तेंदुआ दबे पांव उनके करीब आ गया। अचानक तेंदुए ने हमला किया! धमचक चिंघाड़ना चाहता था, लेकिन छोटी नाक से सिर्फ 'फिस-फिस' की आवाज निकली। वह अपनी सूंड से तेंदुए को उठाकर पटक भी नहीं सकता था। जग्गू पानी में भागना चाहता था, लेकिन लंबे पैरों ने उसे फंसा दिया। लंबू भागने की कोशिश में झाड़ियों में अटक गया।
तीनों मौत के मुंह में खड़े थे। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें समझ आ गया कि प्रकृति ने उन्हें जैसा बनाया था, वह किसी खास मकसद से बनाया था। उनकी कमियां ही उनकी असली ताकत थीं।
वापसी और असली ताकत
तीनों ने मन ही मन उस मायावी झरने और महामुनि को याद किया और सच्चे दिल से प्रार्थना की, "हे वन देवता! हमें माफ कर दो। हमें हमारा पुराना रूप वापस दे दो। हम जैसे हैं, वैसे ही सर्वश्रेष्ठ हैं!"
उनके आँसुओं में सच्चा पछतावा था। तभी एक चमत्कार हुआ। महामुनि का जादू (जो असल में एक भ्रम था जो उन्होंने उन पर डाला था ताकि वे सबक सीख सकें) टूट गया। धमचक की लंबी सूंड वापस आ गई। लंबू की गर्दन फिर से लंबी हो गई। और जग्गू के पैर वापस छोटे हो गए।
जैसे ही उनका असली रूप लौटा, धमचक ने जोर से चिंघाड़ लगाई, जिससे तेंदुआ डर गया। लंबू ने अपनी लंबी गर्दन से देखा कि तेंदुआ किस तरफ भाग रहा है। जग्गू ने अपनी शक्तिशाली पूंछ और जबड़ों का प्रदर्शन किया। तीनों की संयुक्त ताकत देखकर तेंदुआ दुम दबाकर भाग गया।
निष्कर्ष: अपनी पहचान पर गर्व
उस दिन के बाद से, तीनों दोस्तों ने कभी अपने शरीर की शिकायत नहीं की। धमचक अपनी सूंड से सबको नहलाता, लंबू सबसे ऊंचे और मीठे फल तोड़कर दोस्तों को देता, और जग्गू नदी की सैर कराता।
दोस्ती और खुद को स्वीकार करने की यह कहानी जंगल में आज भी सुनाई जाती है। महामुनि कछुआ दूर से उन्हें देखकर मुस्कुराता रहता है। उन्होंने बच्चों को सबसे बड़ी सीख दी थी - "हम जैसे हैं, वैसे ही अनमोल हैं।"
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
आत्म-स्वीकृति (Self-Acceptance): भगवान ने हमें जैसा बनाया है, उसमें कोई न कोई खूबी छिपी है।
हर अंग का महत्व: शरीर का हर हिस्सा किसी खास काम के लिए बना है, उसे कमतरी नहीं समझना चाहिए।
नकल में नुकसान: दूसरों जैसा बनने की कोशिश में हम अपनी असली पहचान और ताकत खो देते हैं।
और पढ़ें : -
सोने की गिलहरी की कहानी | Jungle Story
खुरापाती तेंदुआ: जब टिंकू की शरारत उस पर ही भारी पड़ी
बुद्धिमान तोता: मिंटू और चंदनवन का रक्षक
बेईमानी की सजा: झुमरू बंदर और रंगीला वन का सबक
Tags : जंगल कहानी | छोटी जंगल कहानी | बच्चों की जंगल कहानी | बच्चों की हिंदी जंगल कहानी | बेस्ट जंगल कहानी | मजेदार जंगल कहानी | मज़ेदार जंगल कहानी पढ़ें | हिंदी जंगल कहानी
